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  • Abhishek Chourasia

सृजन की प्रक्रिया

प्राकृति प्रत्येक क्षण किसी न किसी सृजन को जन्म देती है इसकारण सृजन का निसर्ग से सबसे निकट का सम्बन्ध है फिर इसके बाद इंसान से नाता होता है सृजन का तात्पर्य स्वतंत्रता से है फलस्वरुप निसर्ग ने जितने भी घटको की रचना की वे अपनी स्वतंत्र दुनिया बना लेते है उस सृजन को देखकर हम मंत्रमुग्ध हो जाते है उस समय हम सिर्फ उसकी सौंदर्यता मे खो जाते है। केवल उस रचना को हम महसूस कर पाते है परंतु सृजनता की गहराइयों की कल्पना करना उतना मुश्किल होता है जैसे बंद आखो से किसी पुस्तक के शब्दो को पड़ पाना होता है। फिरभी उस सृजन का अनुभव किसी अद्भुत के भाती होता है।

मेरा तो मानना है की संसार के हर व्यक्ति को सृजन की अनुभूति होना ही चाहिये इसके बग़ैर उस मनुष्य का जिवन निरर्थक है उसका जिना किसी काम का नही होता, ऐसे लोग निसर्ग की सुन्दरता से दूर होते है ये लोग कभी भी सृजन के मूल्यो को कभी समझ नही सकते।


सृजन की उत्पत्ति का प्रयोग ऐसे प्रयोगशाला मे हुआ है जहा संकल्पनाओं, रचनाओं, तर्क अथवा वितरकों के गहन संघर्ष और प्रयोग होते है यह तो अचेतन मन मे बीज रोपण करके चेतना के धरातल मे साकार होता है यह निर्माण सौन्दर्य अथवा कुरूप भी हो सकता है। क्युकी सृजन का सम्बन्ध हमारे प्रशिक्षण तथा अभ्यास और हमारी कल्पना व अद्य्यात्मिक शक्तियों के अधीन होता है। इस सृजन का प्रयोग निरन्तर शुरु रहता हैं। यह प्रयोग केवल नई सृजन मे रुपान्तर होकर ही ठहरता है यह ठहराव भी बहोत महत्वपूर्ण है, क्युकी इस ठहराव मे ही हमरी मानसिक शक्ति और चिन्तन व मनन से सृजन अपनी नई राह मे निकल पड़ता है। और जब सृजन अपने पूर्ण स्वरुप को प्राप्त करलेता है तब वह स्वतंत्र हो जाता है, इसी क्रिया को देखकर कलाकार और प्रेक्षक को खुशी मिलती है। जिसे हम केवल महसूस कर सकते है।


मेरी इस कृति को देखने पर आपको सृजन की नवीन प्रक्रिया प्रतित होगा जिसमे नई दिशा और मेरे कुछ प्रयोग का दर्शन होगा अभितक जो भी संकल्पनाएं निर्मित हुई है उनसे यह कृतिया भिन्न है इस समय इन प्रयोगो की बहुत आवश्यकता है। ये प्रयोग मेरे अन्तर्मन मे बीते कुछ दिनो से सुरु था जिसे मै अब स्वरुप दे सका आगे भी और नवीन कल्पनाओं, विचारो पर प्रयोग होते रहेंगे।

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