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  • Abhishek Chourasia

CONSERVATION OF KING OF JUNGLE

India is a nation on this earth where not only gods and godesses, great souls, deities, teachers and parents are revered. But the birds and animals chosen by the deities are worshipped too. Rat is revered as the chariot of the deity Lord Ganesha. The same way Tiger is worshipped as the chariot of Godess Durga. In ancient times in the villages and towns because of natural equilibrium humans and animals co-existed peacefully. But because of ignorance of humans started destruction of healthy environment and this led to sufferings. The ignorant not only disturbed the flora and fauna but also the rivers and hills and also the king of the jungle was not spared.

Presently the meagre population of tigers are also being finished illegaly. May be the future generation will be taught about tigers the way we describe them the extinct dinosaurs. The diminishing numbers of tigers at a fast pace gave my heart a shock, because almighty has blessed me with an artist's soft heart. Hence I have taken up the brush to make the society aware of the diminishing number of tigers and the topic of my work is Conservation of the Jungle King.

Through my artwork I wish to convey the message that if the tiger is not present in physical form we may be forced to introduce it through the tiger dance. This is the very reason for which you see the tiger in my paintings. I wish to convey this message to each and every corner of India. But being born and brought up in a middle class family the limitations are to spread my work on a mass scale. Inspite of all this I am slogging so that I get success in my mission.

I am overwhelmed to learn that through Art Research inspirational art and artists are awarded fellowship. If ever offered such facility I would work whole heartedly to spread the Indian ethos through my work. I would portray my art work the world over. I would influence the intellectuals and I am confident that I will accomplish my mission. If I have ever exaggerated my feelings I tender my apologies.

वनराजकासंरक्षण


पृथ्वी पर भारत एक अैसा देश है, जहॉं न केवल देवी देवताओं के प्रतिमाओंका संतमहात्माओ का, माता-पिता का तथा गुरूजनों का पूजन किया जाता है। अपितु देवी-देवताओं द्वारा चयन कियेगए पशु-पक्षियों का भी पूजन किया जाता है। मूशक का पूजन प्रथम पूज्य श्री, गणेशजी के वाहन के रूप में किया जाता हैं। तो बाघ का पूजन भगवती दुर्गा के वाहन के रूप में किया जाता है। एक समय था जब प्रकृती संतुलन होने के कारण गॉंव-देहातो मे महानगरो में तथा वन में वास करने वाले समस्त जीव स्वस्थ जीव ननिर्वाह करते थे, किंतु अज्ञांवश जब मनुष्य ने प्रकृती कों हानी पहुचाना आरंभ किया परिणाम स्वरूप मनुष्य जाति भी रूग्णता कों उपलब्ध हो गई। वन प्रकृती के संतुलन में मुख्य भुमिका निभाते है। अज्ञानियों ने न केवल वनोंको नाश किया बल्कि नदी, पर्वतो को भी दूशित किया साथ ही वन के राजा बाग को भी समाप्त करने का प्रयास किया।


अब अल्प संख्या में बचें हुए बाघों को भी गैर कानुनी रूप से नष्ट कर दिये जाएगा तब हम भावी पीढी को बाघ के संदर्भ में ज्ञान उसी प्रकार कराएगे जिस प्रकार लुप्त हो चुके ड्रायनासोरों के विषय में विध्यार्थीयों को ज्ञान प्रदान कर रहे है। तीव्रगति के संग बाघों की घटती संख्या नें मेरे हृदय में चितंन को जन्म दिया हैं। क्योंकि विधाता ने मुझे कलाकार का हृदय प्रदान किया है। सृजन कें गुनो से मुझे धन्य किया है। अतएव बाघ के संरक्षक हेतु समाज में जन जागृती लाने के उपदेश्य से मैने अपनी कुचिका उठाई और अपनी चित्रकला के माध्यम सें जन-जन का ध्यान इस और आकर्शित करने हेतु मैने अपनी चित्रकला का शीर्षक चुना ‘वनराज का संरक्षण’


मेरी कलाकृतीयो के माध्यम से मैं समाज में यह संदेश प्रेशित करने का प्रयास कर रहा हु। कि ईश्वर ने कल यदी अस्तित्व में बाघ नहीं रहे तो हम आगामी पीढीं को ‘बाघ लोकनृत्य’ के माध्यम से बाघ के स्वरूप सें परीचीत कराएगें। यही कारण है कि मेरी प्रत्येक कलाकृती में आप मनुष्य को ही बाग के रूप में पाओगे। इस संदेश को मै भारत के कोने-कोने तक प्रसारित करना चाहता हु। किंतु एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्म लेने के कारण विस्तार की सीमाए है। इसके उपरान्त भी मै अथक श्रम कर रहा हू, ताकि मै अपने लक्ष्य में सफल हो पाऊॅं।


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